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देशभर में सिमटती वाम राजनीति… बंगाल से त्रिपुरा तक घटती पकड़, केरलम भी बदल सकता समीकरण – left parties decline india lok sabha west bengal kerala exit poll political analysis ntc agkp


भारत में कम्युनिस्ट पार्टी यानी वामपंथी ताकत का सूरज डूब रहा है. पश्चिम बंगाल में तो ये पार्टी बिल्कुल खत्म हो गई है. असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में सिर्फ कुछ छोटे-मोटे इलाकों में बची है. केरलम ही आखिरी जगह रह गई है जहां कम्युनिस्ट पार्टी की अभी भी ताकत है. लेकिन इस बार का एक्जिट पोल भी बताता है कि केरलम में भी कांग्रेस आगे निकल सकती है. अगर ऐसा होता है तो भारत में वामपंथी दलों का एक और बड़ा सफाया हो जाएगा.

‘लेफ्ट फ्रंट’ यानी वामपंथी मोर्चे में चार पार्टियां हैं. पहली है कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) यानी CPI(M). दूसरी है कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI. तीसरी है फॉरवर्ड ब्लॉक और चौथी है रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी यानी RSP. अपने समय में ये पार्टियां बेहद शक्तिशाली थीं. पश्चिम बंगाल, केरलम और त्रिपुरा में इनका राज था.

लोकसभा में कितना गिरावट आया?

1999 के लोकसभा चुनाव में CPI(M) को 33 सीटें मिलीं. 2004 में ये बढ़कर 43 हो गईं और उनका वोट शेयर 5.7 फीसदी था. ये उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन था. लेकिन उसके बाद सब कुछ उलटा हो गया. 

2024 के लोकसभा चुनाव में CPI(M) को सिर्फ 4 सीटें मिलीं और उनका वोट शेयर गिरकर 1.8 फीसदी रह गया. CPI भी 2004 में 10 सीटों से गिरकर 2024 में 2 सीटों पर आ गई. फॉरवर्ड ब्लॉक और RSP को कोई सीट नहीं मिली. छह चुनावों में वामपंथी दलों की 50 से ज्यादा सीटें 5-6 सीटों तक गिर गईं. 

पश्चिम बंगाल में क्या हुआ?

बंगाल में वामपंथियों का पतन सबसे नाटकीय था. CPI(M) ने 34 साल तक लगातार बंगाल पर राज किया. 2006 के विधानसभा चुनाव में CPI(M) अकेले 294 में से 176 सीटें जीती. उनका वोट शेयर 37 फीसदी से ज्यादा था. फॉरवर्ड ब्लॉक ने 23 सीटें जीतीं और RSP को 20 मिलीं. वामपंथी मोर्चा ऐसा लग रहा था कि उसे कोई हरा नहीं सकता.

फिर 2011 आया. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों को सत्ता से निकाल दिया. 2016 तक CPI(M) के पास सिर्फ 26 सीटें रह गईं. 2021 के विधानसभा चुनाव में CPI(M), CPI, फॉरवर्ड ब्लॉक और RSP में से किसी को एक भी सीट नहीं मिली. 34 साल की सत्ता एकदम खत्म हो गई. 2026 में तो माना जा रहा है कि बंगाल में चुनाव सिर्फ TMC और BJP के बीच है, वामपंथियों की कोई अहमियत ही नहीं रह गई.

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त्रिपुरा की कहानी क्या है?

त्रिपुरा में भी ऐसा ही हाल है. 2003 में CPI(M) को 60 सीटों में से 38 मिलीं. 2008 में 46 और 2013 में 49. ये पार्टी 20 साल से ज्यादा समय तक त्रिपुरा पर राज करती रही.

लेकिन 2018 में BJP आ गई. CPI(M) एकदम ढह गई. उसे सिर्फ 16 सीटें मिलीं. CPI, RSP और फॉरवर्ड ब्लॉक को एक भी सीट नहीं मिली. कुछ सालों में राज से उखड़ गए.

केरलम में क्या है खास?

सब जगह वामपंथी टूट रहे हैं लेकिन केरलम अलग है. यहां न सिर्फ वामपंथी बचे हैं बल्कि मजबूत भी हुए हैं. 2001 के विधानसभा चुनाव में CPI(M) को 23 सीटें मिलीं. 20 साल बाद 2021 में वो संख्या 62 हो गई. यानी 2.5 गुना बढ़ गई. CPI भी 2001 में 7 सीटों से बढ़कर 2021 में 17 सीटों पर आ गई.

केरल ही एकलौता राज्य है जहां वामपंथी अभी भी ताकतवर हैं. और केरल का एक और गौरव है कि दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार यहीं बनी थी.

लेकिन इस बार केरल का क्या होगा?

इस बार का एक्जिट पोल बताता है कि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) वापस सत्ता में आ सकता है. केरलम में एक पैटर्न है. हर 5 साल में सत्ता LDF (Left Democratic Front) और UDF के बीच बदलती है.

अगर इस बार वामपंथी पार्टियां केरलम में भी हार जाती हैं तो भारत में उनका एक और बड़ा सफाया हो जाएगा. जहां वो एक दिन सबसे शक्तिशाली थे वहां अब सिर्फ पांच सीटें भी नहीं जीत पा रहीं.

ये सब कैसे हुआ?

विशेषज्ञों का कहना है कि वामपंथी दलों ने आधुनिक समय के साथ तालमेल नहीं बिठाया. जनता की बदलती सोच को समझ नहीं पाए. जब वो 34 साल तक बंगाल में सत्ता में थे तो भ्रष्टाचार और आलाकारी के आरोप लगे. किसान विरोधी नीतियां बना. ये सब चीजें जनता को याद हैं.

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