बंगाल में सुर का सियासी पलटवार: ‘मुर्शिद’ से ‘मोदी’ तक, एक धुन ने पलटा नैरेटिव – bengal politics song murshid to modi narrative shift ganga jamuna tune bmsp

बंगाल में सुर का सियासी पलटवार: ‘मुर्शिद’ से ‘मोदी’ तक,


पश्चिम बंगाल की राजनीति सिर्फ भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रही, यहां संस्कृति भी चुनावी माहौल को प्रभावित करती रही है. रवींद्र संगीत से लेकर लोकधुनों और फिल्मी गीतों तक, हर माध्यम यहां जनता से जुड़ने का जरिया बन जाता है. यही वजह है कि बंगाल में राजनीति अक्सर भावनाओं, पहचान और सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ आगे बढ़ती है. इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जब एक पुरानी, दर्द से भरी फिल्मी धुन ने चुनावी मैदान में नया अर्थ और नया रंग ले लिया. एक ऐसा रूप, जिसमें संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि संदेश और रणनीति का हिस्सा बन गया.

चुनाव प्रचार के दौरान एक्ट्रेस-नेता सयोनी घोष का गाया हुआ गीत –

‘मुर्शिद जार सखा, तार किसेर भावना,

आमार हृदोय माझे काबा, नयोने मदीना…’

(जिसका मार्गदर्शक (मुर्शिद) खुदा जैसा हो, उसे किसी बात की चिंता नहीं होती;
मेरे दिल में काबा बसता है और मेरी आंखों में मदीना.’

तेजी से लोगों के बीच फैल गया. इस गीत में सूफियाना रंग, आस्था और आत्मिक जुड़ाव की गहराई झलकती है, जिसने इसे महज एक प्रचार गीत नहीं रहने दिया, बल्कि एक भावनात्मक अभिव्यक्ति बना दिया- ऐसी अभिव्यक्ति, जिसने राजनीति को सीधे दिल से जोड़ने का काम किया.

सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ. यह गीत महज एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं था, बल्कि उसमें सूफियाना भाव, आस्था और एक गहरे आत्मिक जुड़ाव की झलक थी. बंगाल की मिट्टी में रची-बसी यह परंपरा लोगों के दिलों को छू गई.

इस गीत को कुछ लोगों ने सिर्फ एक सूफियाना अभिव्यक्ति के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे मुस्लिम तुष्टीकरण के नजरिये से भी जोड़ा. चुनावी माहौल में इसके बोल और प्रतीकों को लेकर बहस छिड़ी, जहां एक पक्ष ने इसे आस्था और संस्कृति की अभिव्यक्ति माना, वहीं दूसरे पक्ष ने इसे खास समुदाय को साधने की कोशिश बताया.

…लेकिन जैसे ही चुनाव के नतीजे आए, उसी धुन ने अचानक एक नया रूप ले लिया- 

‘मोदी जार नेता, तार किसेर भावना,
आमार हृदोय माझे राधा, नोयने कृष्णा…’

(जिसके नेता मोदी हैं, उसे किसी बात की चिंता नहीं;

मेरे दिल में राधा बसती हैं और मेरी आंखों में कृष्ण)

यानी वही सुर, वही लय… लेकिन भाव पूरी तरह राजनीतिक. यही भारतीय लोकतंत्र की खासियत भी है- जहां कला और राजनीति एक-दूसरे में घुल-मिल जाती हैं.

फिल्मी धुन से चुनावी जिंगल तक

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में है 1961 की क्लासिक फिल्म ‘गंगा जमुना’ का मशहूर गीत- 

‘दो हंसों का जोड़ा
बिछड़ गयो रे… गजब भयो रामा,
जुलम भयो रे…’

इस कालजयी रचना को वैजयंती माला और दिलीप कुमार पर फिल्माया गया था.

नौशाद की बनाई इस धुन को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी और शब्द थे शकील बदायुनी के. यह गीत विरह, पीड़ा और बिछड़ने की वेदना का ऐसा चित्र खींचता है, जो दशकों बाद भी उतना ही प्रभावी है.

‘दो हंसों का जोड़ा’ मूलतः एक निजी दुख की कहानी है- प्रेम के बिछड़ने का दर्द.लेकिन राजनीति ने उसी दर्द को अपने हिसाब से ढाल लिया.

धुन का रूपांतरण: भावना से बयान तक

संगीत की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वह सीमाओं में नहीं बंधता. एक ही धुन- कभी सूफी भक्ति का माध्यम बनती है, कभी व्यक्तिगत विरह का और कभी राजनीतिक संदेश का.

सयोनी के गाए संस्करण में जहां आध्यात्मिकता और प्रेम की झलक थी, वहीं चुनाव बाद उसी धुन पर बना नया नारा सीधे-सीधे सत्ता और नेतृत्व की स्वीकृति का प्रतीक बन गया.

यह बदलाव सिर्फ शब्दों का नहीं, बल्कि भाव का भी है. पहले जहां ‘मुर्शिद’ यानी गुरु/ईश्वर के प्रति समर्पण था, अब वहां ‘नेता’ के प्रति विश्वास और समर्थन दिखाया गया.

बंगाल की राजनीति में सांस्कृतिक हथियार

बंगाल में राजनीति हमेशा से सांस्कृतिक प्रतीकों के सहारे आगे बढ़ी है…कभी रवींद्र संगीत, कभी लोकगीत, तो कभी फिल्मी धुनें.

ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जहां संदेश सिर्फ सुना नहीं, महसूस भी किया जाता है.

इस बार ‘दो हंसों का जोड़ा’ की धुन ने यही काम किया—एक पुरानी याद को नई बहस में बदल दिया.

धुनें कभी पुरानी नहीं होतीं

समय बदलता है, सियासत बदलती है, लेकिन धुनें नहीं बदलतीं. वे सिर्फ नए मायने ओढ़ लेती हैं.
नौशाद की बनाई यह धुन, जो कभी प्रेम-विरह की कहानी कहती थी, आज राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गई है.और यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू है- भारत में संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति और प्रभाव का सबसे सशक्त माध्यम भी है.

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