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कैलाश मानसरोवर यात्रा में नेपाल का अड़ंगा! लिपुलेख विवाद पर भारत ने दिया दो टूक जवाब – nepal india china diplomatic protest note lipulekh kailash mansarovar yatra ntc dhrj

कैलाश मानसरोवर यात्रा में नेपाल का अड़ंगा! लिपुलेख विवाद पर


नेपाल की बालेन सरकार ने भारत और चीन को एक कूटनीतिक पत्र यानी डिप्लोमैटिक प्रोटेस्ट नोट भेजा है. यह मामला लिपुलेक पास से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा के संचालन से जुड़ा हुआ है, जिस पर नेपाल ने आपत्ति जताई है. नेपाल का कहना है कि यह इलाका उसकी भूमि का हिस्सा है और इस पर कोई भी गतिविधि स्वीकार नहीं है. हालांकि भारत ने नेपाल की आपत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है. MEA ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख दर्रे पर नेपाल का दावा न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और न ही न्यायसंगत.

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोकबहादुर पौडेल क्षेत्री ने साफ कर दिया है कि लिपुलेक के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा चलाने की योजना पर उन्हें सख्त आपत्ति है. नेपाल का कहना है कि यह उनकी जमीन है और बिना उनकी मर्जी के वहां कोई गतिविधि नहीं होनी चाहिए. इस मुद्दे पर नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बताया कि यह फैसला किसी एक नेता का नहीं है, बल्कि नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियों से बातचीत करने के बाद ही यह ‘प्रोटेस्ट नोट’ भेजा गया है. यानी पूरा नेपाल इस मुद्दे पर एक सुर में बात कर रहा है.

अब सवाल उठता है कि आखिर नेपाल अचानक इतना सख्त रूप क्यों अपना रहा है?  तो, इसकी जड़ 1816 की ‘सुगौली संधि’ में छिपी है. नेपाल सरकार का दावा है कि इस संधि के हिसाब से महाकाली नदी के पूर्व में पड़ने वाला लिम्पियाधुरा, लिपुलेक और कालापानी का पूरा इलाका नेपाल का हिस्सा है. नेपाल इस बात पर पूरी तरह अडिग है कि ये जगहें उसके नक्शे का अभिन्न अंग हैं.

चिट्ठी में चेतावनी और पुराने दावों का दम

नेपाल ने जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसमें साफ-साफ लिखा है कि उन्होंने अपना रुख भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक रास्तों से बता दिया है. नेपाल की बालेन सरकार का कहना है कि वे पहले भी कई बार भारत सरकार से कह चुके हैं कि इस इलाके में सड़क बनाना, व्यापार करना या तीर्थयात्रा जैसी कोई भी चीज न की जाए. लेकिन जब बात आगे बढ़ी, तो नेपाल ने अब औपचारिक विरोध दर्ज करा दिया है.

‘लिपुलेक पर हमारा रुख साफ, एकतरफा दावे मंजूर नहीं’- भारत की दोटूक

नेपाल की इस आपत्ति पर भारत के विदेश मंत्रालय ने भी अपना पक्ष पूरी मजबूती और सफाई के साथ रखा. भारत ने दोटूक कहा कि लिपुलेक पास के जरिए कैलाश मानसरोवर की यात्रा कोई नई बात नहीं है, बल्कि 1954 से ही तीर्थयात्री इसी पुराने रास्ते का इस्तेमाल करते आ रहे हैं. यानी दशकों से चली आ रही इस परंपरा को नया विवाद बताना गलत है. भारत ने साफ कर दिया कि नेपाल जो जमीन को लेकर नए दावे कर रहा है, ये दावे ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर कहीं नहीं टिकते और न ही इनका कोई ठोस आधार है. अपनी मर्जी से सीमा को बढ़ा-चढ़ाकर बताना पूरी तरह से गलत और निराधार है. हालांकि, भारत ने बड़प्पन दिखाते हुए यह भी कहा कि वह नेपाल के साथ हर मुद्दे पर बातचीत के लिए तैयार है और डिप्लोमेसी के जरिए सीमा विवाद सुलझाने के पक्ष में है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों से कोई समझौता नहीं होगा.

देखा जाए तो यह विवाद काफी पुराना है. नेपाल अक्सर लिपुलेक और कालापानी को लेकर अपना दावा ठोंकता रहा है. लेकिन इस बार बालेन सरकार का अंदाज थोड़ा जुदा है, क्योंकि उन्होंने भारत के साथ-साथ चीन को भी लपेटे में ले लिया है. नेपाल का मानना है कि इस क्षेत्र से जुड़ी संवेदनशीलता को दोनों बड़े देशों को समझना चाहिए.

नेपाल ने कूटनीतिक चिट्ठी भेजकर अपनी तरफ से अड़ंगा लगाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन भारत ने भी पलटवार करते हुए इसे बेबुनियाद बता दिया है. अब देखना यह है कि नेपाल की इस नाराजगी के बीच आने वाले दिनों में यह यात्रा क्या मोड़ लेती है.

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