पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, लेकिन इनमें से दो राज्यों में अभी भी संवैधानिक ऊहापोह की स्थिति बनी है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के राज्यपालों के सामने इस समय अलग-अलग लेकिन गंभीर संवैधानिक चुनौतियां खड़ी हैं. तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर.एन. रवि दोनों को अपने संवैधानिक विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए नाजुक फैसले लेने हैं. इन दो राज्यों की परिस्थितियों की चर्चा देश भर में हो रही है.
तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद किसी को बहुमत नहीं मिला है और त्रिशंकु विधानसभा जैसी स्थिति बन गई है. यहां अभिनेता से नेता बने विजय थलपति की तमिलाग वेट्री कड़गम (TVK) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उसे पूर्ण बहुमत यानी कि 118 सीटें हासिल नहीं हो पाई है. ऐसी स्थिति में राज्यपाल आर्लेकर को यह तय करना है कि सरकार बनाने का पहला न्योता किसे दिया जाए.
वहीं पश्चिम बंगाल में स्थिति पूरी तरह अलग है. यहां बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला है, लेकिन ममता बनर्जी ने चुनाव हारने के बावजूद इस्तीफा नहीं दिया. इसके बाद राज्यपाल आर एन रवि को मजबूरन विधानसभा भंग करनी पड़ी. लेकिन अगले दो दिनों तक राज्य की विधायी कमान को लेकर अभी भी अनिश्चितता बरकरार है.
तमिलनाडु में ‘विजय’ के बाद की बाधा
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में TVK को इस बार 108 सीटें मिली हैं. 234 सदस्यों वाली तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. कांग्रेस ने 5 विधायकों के साथ TVK के विजय को समर्थन देने की घोषणा की है, बावजूद इसके विजय (108+5=113) सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से दूर हैं.
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राज्यपाल को सबसे पहले स्पष्ट बहुमत वाले गठबंधन या दल को मौका देना चाहिए. आर्लेकर ने विजय से लिखित समर्थन पत्र मांगे हैं और कहा है कि 118 विधायकों का समर्थन साबित किए बिना सरकार बनाने का दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के एस आर बोम्मई मामले में फैसलों में फ्लोर टेस्ट पर जोर दिया गया है, लेकिन गलत निर्णय की स्थिति में राज्यपाल पर पक्षपात के आरोप लगने की आशंका है.
अब बहस इस पर हो रही है कि सरकार बनाने वाली पार्टी को बहुमत लोकभवन में साबित करनी चाहिए या विधानसभा में.
TVK दो बार राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर से मिल चुके हैं. बैठक के बाद लोक भवन ने एक बयान में कहा, “बैठक के दौरान माननीय राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का समर्थन अभी तक सिद्ध नहीं हो पाया है.”
इस बीच राज्य में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं. अब देखना होगा कि TVK चीफ विजय अब आगे क्या करेंगे?
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आरएन रवि के सामने चुनौती
चुनाव हारने के बाद ही ममता बनर्जी ने सीएम पद से इस्तीफा न देने का ऐलान कर चौंका दिया था. भारत में ये राजनीतिक परंपरा रही है कि चुनाव हारने के बाद सीएम अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप देते हैं. लेकिन ममता इस परिपाटी के खिलाफ चली गईं और कहा कि इस चुनाव में उनकी नैतिक विजय हुई है.
पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को खत्म हो रहा था. अब ममता के इस्तीफे का दो दिनों तक इंजतार करने के बाद राज्यपाल आर एन रवि ने गुरुवार देर शाम को पश्चिम बंगाल विधानसभा भंग कर दी.
ममता बनर्जी अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री नहीं हैं. भले ही उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया हो. उनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है, क्योंकि राज्यपाल ने अनुच्छेद 174 (2)(b) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए विधानसभा को भंग कर दिया है.
भारत सरकार के पूर्व सचिव जवाहर सरकार के अनुसार इस दौरान जब तक नई सरकार शपथ नहीं ले लेती तब तक राज्यपाल अंतरिम प्रभार संभालते हैं. यह राष्ट्रपति शासन नहीं है. यह एक अंतरिम व्यवस्था है.
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